दिन 9 (जून): मौन का मूल्य और वाणी का संयम
(The Value of Silence and Discipline of Speech)
भारतीय दर्शन से विचार: “न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।” – प्राचीन सूक्ति
व्याख्या: “वह सत्य मत बोलो जो अप्रिय (Unpleasant) हो।” (अर्थात्, मौन या मधुर, हितकारी वाणी को चुनो)।
Stoicism से उद्धरण: “मौन को अपना सामान्य नियम बनाओ; या केवल वही बोलो जो आवश्यक हो और बहुत कम।” – एपिक्टेटस (Epictetus)
व्याख्या: विवेक (Discernment) सिर्फ विचारों को नियंत्रित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वाणी के संयम में भी प्रकट होता है। दोनों दर्शन सिखाते हैं कि अधिक बोलना मन की अस्थिरता का संकेत है और अक्सर अनावश्यक विवाद या गपशप की ओर ले जाता है। बुद्धिमान व्यक्ति अपनी शक्ति को संरक्षित करने के लिए मौन (Mauna) का चुनाव करता है। जब बोलना आवश्यक हो, तो हमें सत्य को भी इस तरह से प्रस्तुत करना चाहिए कि वह अप्रिय न हो, जिससे हमारे शब्द प्रभावी और दयालु दोनों बनें।
अभ्यास: आज आप अपनी बातचीत को आधा करने का प्रयास करें। बोलने से पहले, एक पल रुकें और स्वयं से पूछें: “क्या यह बोलना आवश्यक है, या क्या मैं मौन रह सकता हूँ?” ध्यान दें कि इस अभ्यास से आपके मन की एकाग्रता (Concentration) में कितनी वृद्धि हुई।
प्रस्तुति
डॉ आनंद कुमार शर्मा द्वारा संकलित और सम्पादित पुस्तक “भारतीय दर्शन और पश्चिमी योग (Stoicism)-365 आध्यात्मिक अभ्यास” से साभार
