दिन 27 (सितम्बर)

भारतीय दर्शन से विचार: “उस सबसे बुरे (Worst) के लिए तैयार रहो जो हो सकता है, ताकि सबसे अच्छा कर्म (Action) कर सको।” – विपत्ति-स्मरण (Vipatti-Smaraṇa) सिद्धांत का सार

व्याख्या: अस्थिर (Anitya) संसार में हानि (Loss) अनिवार्य है। सचेत रूप से संकट का पूर्वाभ्यास करने से हम वर्तमान में शांत रहते हैं और वास्तविक संकट आने पर विवेक (Reason) से प्रतिक्रिया करते हैं।

Stoicism सेउद्धरण: “वह वर्तमान की बुराइयों की शक्ति को छीन लेता है, जिसने उनके आने को पहले ही भांप लिया हो।” – सेनका (Seneca)

व्याख्या: करुणापूर्ण कर्म (Compassionate Action) के लिए मानसिक दृढ़ता (Mental Resilience) आवश्यक है। दोनों दर्शन सिखाते हैं कि जब हम अचानक किसी हानि या कष्ट से हैरान होते हैं, तो हम घबराहट (Panic) या क्रोध से प्रतिक्रिया करते हैं, जिससे हमारी करुणा और कर्तव्य (Dharma) बाधित होते हैं। बलवान कर्ता जानबूझकर Premeditatio Malorum का अभ्यास करता है। मानसिक पूर्वाभ्यास हमें यह पुष्टि करने देता है कि हमारा वास्तविक धन (सद्गुण) अविनाशी है, जिससे हम अविचलित रहते हैं और संकट के दौरान भी दूसरों के लिए सेवा (Sevā) करना जारी रख पाते हैं।

अभ्यास: आज आप एक गैर-जरूरी बाहरी चीज का मानसिक रूप से त्याग करें जिसका आप बहुत मूल्य करते हैं (जैसे कोई संपत्ति, आय का एक विशिष्ट स्रोत, या एक आरामदायक आदत)। 3 मिनट तक कल्पना करें कि आपने इसे आज पूरी तरह से खो दिया है। फिर दृढ़ता से पुष्टि करें: “मेरा सद्गुण (Virtue) ही मेरा वास्तविक धन है; यह बाहरी हानि (External Loss) मुझे विचलित नहीं कर सकती।”

प्रस्तुति
डॉ आनंद कुमार शर्मा द्वारा संकलित और सम्पादित पुस्तक “भारतीय दर्शन और पश्चिमी योग (Stoicism)-365 आध्यात्मिक अभ्यास” से साभार

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