दिन 18 (सितम्बर)

भारतीयदर्शनसेविचार: “तुम्हारी शांति (Peace) तुम्हारे अपमान करने वाले से अधिक मूल्यवान है; उसे मौन (Muni Bhāva) से रक्षा प्रदान करो।” – मौन (Mouni) और शांति का सार

व्याख्या: अपमान या निंदा का जवाब देना उस अज्ञान (Ignorance) को शक्ति देना है जिससे वे उत्पन्न होते हैं। मौन ही एक सद्गुणी और करुणामय प्रतिक्रिया है।

Stoicism सेउद्धरण: “यदि कोई तुम्हें गुस्सा दिलाने में सफल होता है, तो समझ लो कि तुम्हारे मन ने उत्तेजना (Provocation) के साथ साँठ-गाँठ कर ली है। इसलिए बाहरी उत्तेजनाओं पर आवेश में प्रतिक्रिया न करना आवश्यक है।” – एपिक्टेटस (Epictetus)

व्याख्या: करुणापूर्ण कर्म (Compassionate Action) के लिए आंतरिक शांति की आवश्यकता होती है। दोनों दर्शन सिखाते हैं कि अपमान बाहरी हैं और आपके चरित्र (Virtue) को हानि नहीं पहुँचा सकते। क्रोध या बचाव में प्रतिक्रिया करना एक कमजोर कर्म है जो आपको आपके कर्तव्य (Dharma) से भटकाता है। मुनि भाव (मौन का अभ्यास) वह शक्तिशाली कर्म है जो अपमान को अमान्य (Invalidates) कर देता है, हमलावर को उसकी मूर्खता में थका देता है, और हमारी आंतरिक शांति को सुरक्षित रखता है।

अभ्यास: आज आप एक परिस्थिति के लिए मानसिक रूप से तैयार रहें जहाँ आपको मामूली आलोचना, निंदा या शिकायत का सामना करना पड़ सकता है। आप रक्षात्मक शब्द बोले बिना, उस हमले को अवशोषित करने के लिए प्रतिबद्ध हों। इसके बजाय, मौन चुनें और मानसिक रूप से पुष्टि करें कि यह अज्ञान से उत्पन्न हुआ है। पुष्टि करें: “मेरा मौन ही मेरी करुणा और शक्ति है।”

प्रस्तुति
डॉ आनंद कुमार शर्मा द्वारा संकलित और सम्पादित पुस्तक “भारतीय दर्शन और पश्चिमी योग (Stoicism)-365 आध्यात्मिक अभ्यास” से साभार

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