दिन 16 (सितम्बर)

भारतीयदर्शनसेविचार: “कष्ट को मित्र मानकर स्वीकार करो; उससे विचलित (Disturbed) न होना ही करुणा है।” – दुःख-निरोध (Dukkha-Nirodha) सिद्धांत का सार

व्याख्या: कष्ट (Dukkha – पीड़ा या बेचैनी) जीवन का अटूट हिस्सा है, लेकिन उस कष्ट के प्रति हमारा मानसिक विरोध ही दुःख (Suffering) पैदा करता है। सही कर्म के लिए शांत मन आवश्यक है।

Stoicism सेउद्धरण: “यदि तुम्हें किसी बाहरी चीज से पीड़ा होती है, तो यह वह चीज नहीं जो तुम्हें विचलित करती है, बल्कि तुम्हारा उसके बारे में निर्णय है। और इस निर्णय को मिटा देना तुम्हारे नियंत्रण में है।” – मार्कस ऑरेलियस (Marcus Aurelius)

व्याख्या: करुणामय कर्म (Compassionate Action) तभी संभव है जब हम पहले अपने और दूसरों के कष्ट की वास्तविकता को स्वीकार करें। दोनों दर्शन सिखाते हैं कि पीड़ा पर भावनात्मक रूप से प्रतिक्रिया करने से हमारी कार्यक्षमता और करुणा दोनों खत्म हो जाती हैं। बलवान मन दर्द (Sensation) और निर्णय (Judgment) के बीच अंतर करना जानता है। कष्ट को शांत मन से स्वीकार करके, हम सहानुभूति (Sympathy) के साथ स्पष्टता से कार्य करने के लिए स्वतंत्र हो जाते हैं।

अभ्यास: आज आप एक हल्का, आवर्ती शारीरिक या मानसिक बेचैनी (Discomfort) पहचानें (जैसे मामूली सिरदर्द, किसी नीरस कार्य से ऊब, या हल्की थकान)। 5 मिनट के लिए, आप बिना शिकायत या तुरंत भागने की कोशिश किए, उस बेचैनी को देखने (Observe) के लिए प्रतिबद्ध हों। मानसिक रूप से सनसनी (Sensation) को मानसिक प्रतिक्रिया (Reaction) से अलग करें। पुष्टि करें: “यह कष्ट (Dukkha) है; मैं शांत और अविचलित हूँ।”

प्रस्तुति
डॉ आनंद कुमार शर्मा द्वारा संकलित और सम्पादित पुस्तक “भारतीय दर्शन और पश्चिमी योग (Stoicism)-365 आध्यात्मिक अभ्यास” से साभार

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