दिन 15 (सितम्बर)

भारतीय दर्शन से विचार: “तुम्हारा इच्छाशक्ति (Saṅkalpa) परिणामों (Results) पर नहीं, बल्कि सद्गुण (Virtue) पर केंद्रित होनी चाहिए।” – संकल्प (Saṅkalpa) सिद्धांत का सार

व्याख्या: संकल्प (Intention/Moral Will) ही कर्म का मूल स्रोत है। यदि हमारी इच्छा (Desire) बाहरी चीजों से प्रेरित है, तो हमारा कर्म अशुद्ध हो जाता है।

Stoicism से उद्धरण: “जीवन में मुख्य कार्य बस यही है: मामलों को पहचानना और अलग करना ताकि मैं खुद से स्पष्ट रूप से कह सकूँ कि कौन सी चीजें बाहरी हैं और मेरे नियंत्रण में नहीं हैं, और कौन सी चीजें मेरे द्वारा किए गए चुनाव (Prohairesis) से संबंधित हैं।” – एपिक्टेटस (Epictetus)

व्याख्या: विवेकपूर्ण कर्म (Virtuous Action) इच्छाशक्ति (Prohairesis/Saṅkalpa) की गुणवत्ता से शुरू होता है। दोनों दर्शन सिखाते हैं कि केवल एक चीज जो हमारे पूर्ण नियंत्रण में है, वह हमारी इच्छाशक्ति है। बलवान कर्ता अपनी इच्छा को केवल धर्म (Duty) और करुणा (Compassion) के साथ कार्य करने के लिए शुद्ध करता है। जब हम जानबूझकर केवल सही को चुनते हैं, तो हर कर्म एक सद्गुणी अभ्यास बन जाता है।

अभ्यास: आज आप एक कार्य पहचानें जिसे आप वर्तमान में बाहरी पुरस्कार (जैसे प्रशंसा, वेतन वृद्धि, या आलोचना से बचना) के लिए कर रहे हैं। मानसिक रूप से उस कार्य के मकसद को पुनः परिभाषित (Re-frame) करें, अपने संकल्प को पूरी तरह से सद्गुण पर केंद्रित करें (उदाहरण: ‘मैं इसे दक्षता के साथ करूँगा, क्योंकि दक्षता मेरा कर्तव्य है’)। पुष्टि करें: “मेरा संकल्प (Saṅkalpa) केवल सद्गुण (Virtue) के लिए है।”

प्रस्तुति
डॉ आनंद कुमार शर्मा द्वारा संकलित और सम्पादित पुस्तक “भारतीय दर्शन और पश्चिमी योग (Stoicism)-365 आध्यात्मिक अभ्यास” से साभार

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