दिन 23 (मई): दूसरों की राय से अनासक्ति
(Detachment from the Opinions of Others)
भारतीय दर्शन से विचार: “तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्।” – श्रीमद्भगवद्गीता (12.19)
व्याख्या: “जो निंदा और स्तुति (बुराई और प्रशंसा) को समान मानता है, जो मौन रहता है, और जो किसी भी चीज से संतुष्ट रहता है।”
Stoicism से उद्धरण: “यदि आप सुधार करना चाहते हैं, तो बाहरी चीजों के संबंध में मूर्ख और बेवकूफ समझे जाने पर संतुष्ट रहें।” – एपिक्टेटस (Epictetus)
व्याख्या: संबंधों में हमारी प्रामाणिकता (Authenticity) तब खतरे में पड़ जाती है जब हम लगातार दूसरों की राय और अनुमोदन की तलाश करते हैं। दोनों दर्शन सिखाते हैं कि मान्यता की खोज (Seeking Approval) हमारी आंतरिक शांति और सद्गुण को नष्ट कर देती है। हमें जानबूझकर प्रशंसा और निंदा (स्तुति और निंदा) को समान समझना चाहिए। Stoic अभ्यास हमें यह याद दिलाता है कि यदि हम अपनी तर्कसंगतता और आंतरिक मूल्यों पर टिके रहते हैं, तो बाहरी लोगों की हमारे बारे में राय हमारी शक्ति को कम नहीं कर सकती।
अभ्यास: आज आप एक छोटा, धर्मनिष्ठ कार्य (Virtuous Action) चुनें, जिसे आप जानते हैं कि कोई करीबी व्यक्ति पसंद नहीं करेगा या पहचानेगा नहीं (उदाहरण के लिए, अपनी सीमा पर टिके रहना, या किसी गपशप में शामिल न होना)। उस कार्य को केवल इसलिए करें क्योंकि यह सही है। उस आंतरिक शक्ति पर विचार करें जो आपको अनुमोदन की आवश्यकता से स्वतंत्रता में मिली।
प्रस्तुति
डॉ आनंद कुमार शर्मा द्वारा संकलित और सम्पादित पुस्तक “भारतीय दर्शन और पश्चिमी योग (Stoicism)-365 आध्यात्मिक अभ्यास” से साभार
