दिन 24 (मई)

भारतीय दर्शन से विचार: “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।” – योगसूत्र (1.2)

व्याख्या: “योग मन की वृत्तियों (विचारों के उतार-चढ़ाव) को रोकना है।” (शांत मन ही पूर्ण रूप से उपस्थित रह सकता है)।

Stoicism से उद्धरण: “तुम जो कुछ भी कर रहे हो, उसमें पूरी तरह से उपस्थित रहो।” – मार्कस ऑरेलियस (Marcus Aurelius)

व्याख्या: संबंधों में सबसे मूल्यवान उपहार आपका ध्यान है। दोनों दर्शन सिखाते हैं कि जब हमारा मन भूतकाल की चिंताओं या भविष्य की योजनाओं में भटका हुआ (चित्त-वृत्ति) होता है, तो हम अपने सामने वाले व्यक्ति को सच्ची उपस्थिति नहीं दे पाते। सच्ची उपस्थिति (Prosochē) तभी संभव है जब हम अपने आंतरिक शोर को शांत करें और उस वर्तमान क्षण पर ध्यान केंद्रित करें। जब आप पूरी तरह से उपस्थित होकर सुनते और बोलते हैं, तो आपका संबंध गहरा होता है और दूसरे व्यक्ति को लगता है कि उन्हें महत्व दिया जा रहा है।

अभ्यास: आज आप किसी करीबी व्यक्ति के साथ 5 मिनट की बातचीत करें। बातचीत के दौरान, अपना फ़ोन पूरी तरह से अलग कमरे में रख दें। केवल अपने विचारों को शांत करें और पूरी तरह से उस व्यक्ति की बात को सुनें। ध्यान दें कि आपके द्वारा दी गई पूर्ण उपस्थिति ने बातचीत की गुणवत्ता को कैसे प्रभावित किया।

प्रस्तुति
डॉ आनंद कुमार शर्मा द्वारा संकलित और सम्पादित पुस्तक “भारतीय दर्शन और पश्चिमी योग (Stoicism)-365 आध्यात्मिक अभ्यास” से साभार

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