दिन 8 (मई)

भारतीय दर्शन से विचार: “निन्दक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय। बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय॥” – कबीर

व्याख्या: “आलोचक को अपने पास ही रखना चाहिए, जो बिना साबुन और पानी के ही आपके स्वभाव को स्वच्छ कर देता है।”

Stoicism से उद्धरण: “यदि कोई तुम्हें भड़काने में सफल होता है, तो समझ लो कि भड़काने में तुम्हारे मन की भी मिलीभगत है।” – एपिक्टेटस (Epictetus)

व्याख्या: संबंधों में आलोचना या अपमान आना अपरिहार्य है। दोनों दर्शन सिखाते हैं कि एक स्वस्थ संबंध और चरित्र बनाए रखने के लिए हमें आलोचना को दोहरी रणनीति से संभालना चाहिए। पहला (कबीर के अनुसार), आलोचना को आत्म-सुधार के एक उपकरण के रूप में देखना। दूसरा (एपिक्टेटस के अनुसार), यह जानना कि अपमान का नुकसान बाहरी शब्द में नहीं, बल्कि हमारी आंतरिक प्रतिक्रिया में निहित है। हम आलोचना को अपनी आत्म-शक्ति को कम करने देने के बजाय, उसे अपने चरित्र को शुद्ध करने के लिए उपयोग कर सकते हैं। अभ्यास: पिछले सप्ताह मिली किसी भी आलोचना या नकारात्मक टिप्पणी को याद करें। उस टिप्पणी को देने वाले व्यक्ति के स्वर और इरादे को पूरी तरह से भूल जाएँ। केवल उस टिप्पणी में छिपी कार्रवाई योग्य सत्य (Actionable Truth) को लिखें। इस सत्य का उपयोग आज ही अपने व्यवहार को सुधारने के लिए करें।

प्रस्तुति
डॉ आनंद कुमार शर्मा द्वारा संकलित और सम्पादित पुस्तक “भारतीय दर्शन और पश्चिमी योग (Stoicism)-365 आध्यात्मिक अभ्यास” से साभार

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