दिन 7 (मई): सक्रिय श्रवण और मौन का मूल्य
(Active Listening and the Value of Silence)
भारतीय दर्शन से विचार: “श्रोता वक्ता च दुर्लभो।” – प्राचीन सूक्ति
व्याख्या: “आदर्श श्रोता (सुनने वाला) और आदर्श वक्ता (बोलने वाला) दुर्लभ होते हैं।”
Stoicism से उद्धरण: “हमारे पास दो कान और एक मुँह है, ताकि हम बोलें उससे दोगुना सुन सकें।” – एपिक्टेटस (Epictetus)
व्याख्या: किसी भी संबंध को मजबूत बनाने के लिए सबसे आवश्यक कौशल सक्रिय श्रवण (Active Listening) है। दोनों दर्शन सिखाते हैं कि अक्सर हम यह सुनने के लिए नहीं बोलते कि दूसरा क्या कह रहा है, बल्कि इसलिए बोलते हैं ताकि हम अपनी बात कहने की तैयारी कर सकें। आदर्श संबंध तभी बनता है जब एक व्यक्ति मौन रहकर दूसरे को पूरी तरह सुनता है। यह जानबूझकर सुनने का कार्य हमें अहंकार से बचाता है और गलतफहमियों को कम करता है, जो समुदाय में सद्भाव बनाए रखने के लिए आवश्यक है। अभ्यास: आज आप किसी एक व्यक्ति के साथ बातचीत करते समय, उन्हें बिना टोके सुनने का अभ्यास करें। जब उनकी बात पूरी हो जाए, तो जवाब देने से पहले उनके कहे गए मुख्य बिंदु को अपने शब्दों में दोहराएँ। अपनी नोटबुक में लिखें कि इस अभ्यास ने आपकी बातचीत की गुणवत्ता को कैसे सुधारा।
प्रस्तुति
डॉ आनंद कुमार शर्मा द्वारा संकलित और सम्पादित पुस्तक “भारतीय दर्शन और पश्चिमी योग (Stoicism)-365 आध्यात्मिक अभ्यास” से साभार
