दिन 6 (मई): देना और ग्रहण करना
(The Practice of Giving and Receiving)
भारतीय दर्शन से विचार: “दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे। देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥” – श्रीमद्भगवद्गीता (17.20)
व्याख्या: “जो दान (gift) ‘यह मेरा कर्तव्य है’ ऐसी भावना से, बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के, उचित देश, काल और पात्र को दिया जाता है, वह सात्त्विक दान कहलाता है।”
Stoicism से उद्धरण: “प्रत्येक लाभ दो चीजों से महान हो जाता है: तेजी और इच्छा।” – सेनेका (Seneca)
व्याख्या: संबंधों को मजबूत करने में देने (Dāna) की कला सबसे महत्वपूर्ण है। भारतीय दर्शन और Stoicism, दोनों ही सिखाते हैं कि देने का सच्चा मूल्य सामग्री में नहीं, बल्कि भावना में निहित है। जब हम बिना किसी अपेक्षा के देते हैं, तो हम एक निस्वार्थ संबंध बनाते हैं। Stoicism हमें सिखाता है कि देने में हमें तत्परता और खुशी दिखानी चाहिए, क्योंकि यह हमारे सद्गुण को दर्शाता है। इस प्रकार दिया गया दान ही रिश्तों में स्थायी सद्भाव लाता है। अभ्यास: आज आप किसी ऐसे व्यक्ति को एक छोटा सा उपहार (या सेवा) दें जो आपसे किसी प्रतिफल की अपेक्षा न रखता हो। उपहार देने के तुरंत बाद, उसके लिए धन्यवाद या मान्यता की प्रतीक्षा न करें—जानबूझकर उस कार्य को भूल जाएँ। अपनी नोटबुक में लिखें कि निस्वार्थ भाव से देने का अनुभव कैसा था।
प्रस्तुति
डॉ आनंद कुमार शर्मा द्वारा संकलित और सम्पादित पुस्तक “भारतीय दर्शन और पश्चिमी योग (Stoicism)-365 आध्यात्मिक अभ्यास” से साभार
