Ved-Vaani – ऋग्वेद || ४-४-२ ||

हम प्रभु का ही स्मरण करें, प्रभु हमें पापों व रोगों से बचाकर आगे ले चलेंगे! हमारा जीवन मधुर, ज्ञान प्रवण व पूजा वृत्ति वाला बनेगा!

व्याख्या

जिस प्रभु को देव वृत्ति लोग प्रतिदिन दिन में तीन बार उपासित करते हैं!

दिन के प्रारंभ में तो उठते ही प्रभु का ध्यान करते ही हैं और उसी प्रकार सायं कार्य समाप्ति पर भी ध्यान में प्रवृत्त होते हैं! दिन में भोजन से पूर्व प्रभु स्मरण करते हैं! इस प्रकार आदि,मध्य व अवसान में इनका। पूजन चलता है!पूजित हुआ वह प्रभु पाप से हमारा निवारण करता है!

मन को अधिकाधिक शुचिता के अनुसार आप धनकी कल्याणमयी मति को हमारे लिए देते हैं!

पवित्रता होने पर हम कभी भी छल छिद्र से धन कमाने का ध्यान नहीं करते हैं!

वह प्रभु हमें रोगों से बचाता है, उन्नति पथ पर आगे ले चलता है!

वे प्रभु हमारे शरीर को न गिरने देने वाले हैं! हे प्रभु! आप हमारे इस जीवन यज्ञ को माधुर्यवाला ज्ञान की उत्पत्ति स्थान व प्रभु परिचर्या वाला करिये !

हम इस जीवन में सदा मधुर बोलने वाले हों, स्वाध्याय द्वारा ज्ञान को निरंतर वृद्धि करने वाले हों तथा प्रभु पूजन की वृत्ति वाले बनें!

देवताओं की तरह भोजन से पूर्व व सायंकाल उस प्रभु का स्मरण अवश्य करें!

वह स्मरण ही तो हमें पापों और रोगों से बचाकर आगे ले चलेंगे और हमें देव बनायेंगे!

मन्त्र का भाव है कि-
हम प्रातः सायं प्रभु स्मरण करें जो हमें पापों और रोगों से बचायेगा, हमारा जीवन मधुर ज्ञान प्रवण व पूजा वृत्ति वाला बनेगा

प्रस्तुतकर्ता

सुमन भल्ला
द्वारका दिल्ली
( वेद प्रचारिका महर्षि दयानंद सरस्वती सेवा समिति)

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