दिन 5 (जून): प्रशंसा से अनासक्ति और आंतरिक मूल्य
(Detachment from Praise and Internal Value)
भारतीय दर्शन से विचार: “मान-अपमानयोस्तुल्यः।” – श्रीमद्भगवद्गीता (12.18)
व्याख्या: “जो मान (सम्मान/Praise) और अपमान (निरादर/Dishonor) में समान रहता है।” (जो दोनों से अप्रभावित रहता है)।
Stoicism से उद्धरण: “लोगों की राय से अपनी शांति को भंग मत होने दो।” – मार्कस ऑरेलियस (Marcus Aurelius) के दर्शन का सार
व्याख्या: ज्ञान (विवेक) की परीक्षा इस बात में है कि आप बाहरी मान्यता को कितना महत्व देते हैं। दोनों दर्शन सिखाते हैं कि प्रतिष्ठा, प्रशंसा, या सम्मान (मान) एक बाहरी, अनियंत्रित वस्तु है। इस पर निर्भर रहना मूर्खता है, क्योंकि यह क्षणभंगुर है और दूसरों के हाथों में है। सच्चा बुद्धिमान व्यक्ति समान (Tulyah) रहता है—वह प्रशंसा से अहंकारी नहीं होता और आलोचना से विचलित नहीं होता। वह अपने आंतरिक सद्गुण को ही एकमात्र सच्चा मूल्य मानता है।
अभ्यास: आज आप अपना कोई एक सद्गुणी कार्य (Virtuous Action) पहचानें (जैसे ईमानदारी से काम करना या धैर्य रखना)। उस कार्य की आंतरिक भलाई पर ध्यान केंद्रित करें और उससे मिलने वाली आंतरिक संतुष्टि को महसूस करें। इस कार्य के लिए किसी भी तरह की बाहरी प्रशंसा या मान्यता (मान) की चेतन रूप से उपेक्षा (Ignore) करें।
प्रस्तुति
डॉ आनंद कुमार शर्मा द्वारा संकलित और सम्पादित पुस्तक “भारतीय दर्शन और पश्चिमी योग (Stoicism)-365 आध्यात्मिक अभ्यास” से साभार
