दिन 29 (जुलाई) : आसक्ति और घृणा से मुक्ति का साहस
(The Courage of Freedom from Craving and Aversion)
भारतीय दर्शन से विचार: “इंद्रियों के विषयों में राग (आसक्ति) और द्वेष (घृणा) व्यवस्थित हैं। मनुष्य को इन दोनों के वश में नहीं आना चाहिए, क्योंकि वे उसके शत्रु हैं।” – श्रीमद्भगवद्गीता (3.34)
व्याख्या: आसक्ति (Rāga) और घृणा (Dveṣa) दो शक्तिशाली आंतरिक शत्रु हैं जो हमारे विवेक और कर्म की शुद्धता को नष्ट करते हैं।
Stoicism से उद्धरण: “तुम्हारी इच्छाएँ (Craving) और घृणाएँ (Aversion) ही तुम्हारी स्वतंत्रता को नष्ट करती हैं।” – Stoic सिद्धांत का सार
व्याख्या: सबसे बड़ा साहस (Sāhas) आंतरिक स्वतंत्रता प्राप्त करने में है। दोनों दर्शन सिखाते हैं कि जब हम अपनी इच्छाओं (Rāga) और नापसंद (Dveṣa) द्वारा निर्देशित होते हैं, तो हम दास बन जाते हैं। साहसी व्यक्ति तर्क और कर्तव्य के आधार पर कार्य करता है, न कि इस बात पर कि कोई कार्य सुखद है या अप्रिय। इन दोनों शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके, मन शांत रहता है, और हमारे कर्म किसी भी अशुद्ध प्रेरणा से मुक्त हो जाते हैं।
अभ्यास: आज आप एक छोटी आसक्ति (Rāga) या एक हल्की घृणा (Dveṣa) पहचानें जो आपको महसूस होती है (जैसे किसी विशेष स्नैक की लालसा, या किसी कठिन ईमेल से बचना)। सचेत रूप से इस आवेग के विपरीत कार्य करें (उदाहरण: लालसा को 10 मिनट के लिए टाल दें, या नापसंद काम तुरंत करें)। देखें कि राग और द्वेष के खिंचाव को नकारने पर आपकी कार्य करने की शक्ति (Courage to act) कैसे बढ़ती है।
प्रस्तुति
डॉ आनंद कुमार शर्मा द्वारा संकलित और सम्पादित पुस्तक “भारतीय दर्शन और पश्चिमी योग (Stoicism)-365 आध्यात्मिक अभ्यास” से साभार
