दिन 27 (जुलाई)

भारतीय दर्शन से विचार: “वाणी का संयम (मित-भाषण) विवेकपूर्ण जीवन का आवश्यक अंग है।” – नीति सिद्धांत का सार

व्याख्या: संक्षेप में और मधुर बोलना न केवल एक सद्गुण है, बल्कि यह मन की ऊर्जा को बचाकर सार्थक कर्म की ओर निर्देशित करता है।

Stoicism से उद्धरण: “अधिकतर तुम्हारा लक्ष्य मौन (Silence) होना चाहिए; जो आवश्यक हो, वही कहो, और कम शब्दों में कहो।” – एपिक्टेटस (Epictetus)

व्याख्या: सच्चा साहस (Sāhas) वाणी के अनुशासन में प्रकट होता है। दोनों दर्शन सिखाते हैं कि अनावश्यक या अत्यधिक बात (गपशप, शिकायत) करना ऊर्जा की बर्बादी है जो हमारे विवेक को धूमिल करती है। साहसी व्यक्ति मित-भाषण (Mita-Bhāṣaṇa) का अभ्यास करता है। वह बोलने के बजाय सुनना चुनता है, और जब बोलता है, तो वह केवल उसी बात को कहता है जो आवश्यक, सत्य और दयालु हो। यह संयम उसे मानसिक स्पष्टता और निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करता है।

अभ्यास: आज आप एक घंटे की अवधि चुनें जिसमें आप जानबूझकर अपनी बातचीत को 50% तक कम करेंगे। इस दौरान, सभी अनावश्यक टिप्पणी, गपशप और शिकायतों से बचें। बोलने से पहले, स्वयं से पूछें: “क्या यह आवश्यक, सत्य और दयालु है?” यदि नहीं, तो मौन रहें।

प्रस्तुति
डॉ आनंद कुमार शर्मा द्वारा संकलित और सम्पादित पुस्तक “भारतीय दर्शन और पश्चिमी योग (Stoicism)-365 आध्यात्मिक अभ्यास” से साभार

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