दिन 26 (मई): परनिंदा से बचना और वाणी का संयम
(Avoiding Slander and Disciplining Speech)
भारतीय दर्शन से विचार: “हितं मितं प्रियं वचः।” – संस्कृत सूक्ति
व्याख्या: “वचन (Speech) हितकारी (Beneficial), सीमित (Limited) और प्रिय (Pleasant) होना चाहिए।” (गपशप इन तीनों का उल्लंघन करती है)।
Stoicism से उद्धरण: “अधिकांश बातचीत व्यर्थ होती है। केवल आवश्यक बातें करो।” – एपिक्टेटस (Epictetus) के दर्शन का सार
व्याख्या: गपशप (परनिंदा) और दूसरों की आलोचना करना समुदाय में विश्वास और सद्भाव को नष्ट कर देता है। दोनों दर्शन सिखाते हैं कि हमें अपनी वाणी पर कड़ा संयम रखना चाहिए। Stoicism बताता है कि व्यर्थ की बातों में शामिल होने से हमारी मानसिक ऊर्जा नष्ट होती है, जो हमें सद्गुण पर केंद्रित करनी चाहिए। भारतीय सिद्धांत एक स्पष्ट मार्गदर्शिका देता है: यदि आपका बोलना किसी के लिए लाभदायक नहीं है, आवश्यक नहीं है, और दयालु नहीं है, तो मौन रहना ही सबसे बड़ा धर्म है।
अभ्यास: आज आप अपनी सभी बातों पर सक्रिय रूप से ध्यान दें। जब भी आप किसी तीसरे व्यक्ति के बारे में बात करने वाले हों जो वहाँ मौजूद नहीं है, तो स्वयं से पूछें: “क्या यह बात हितकारी है, सीमित है और प्रिय है?” यदि उत्तर ‘नहीं’ है, तो जानबूझकर चुप रहें। अपनी नोटबुक में लिखें कि इस मौन ने आपके मन को कितनी शांति दी।
प्रस्तुति
डॉ आनंद कुमार शर्मा द्वारा संकलित और सम्पादित पुस्तक “भारतीय दर्शन और पश्चिमी योग (Stoicism)-365 आध्यात्मिक अभ्यास” से साभार
