दिन 26 (जून)

भारतीय दर्शन से विचार: “सर्वभूतहिते रताः।” – श्रीमद्भगवद्गीता (12.4)

व्याख्या: “जो सभी प्राणियों के कल्याण (Welfare of all beings) में लगे रहते हैं।” (ज्ञान का उपयोग आत्म-विकास के साथ-साथ दूसरों की सेवा में भी होना चाहिए)।

Stoicism से उद्धरण: “हम सहयोग के लिए बनाए गए हैं, जैसे पैर, जैसे हाथ, जैसे पलकें। एक-दूसरे के विरुद्ध कार्य करना प्रकृति के विरुद्ध है।” – मार्कस ऑरेलियस (Marcus Aurelius)

व्याख्या: सच्चा ज्ञान (विवेक) निष्काम कर्म और करुणा (Karunā) से पूर्ण होता है। दोनों दर्शन सिखाते हैं कि चूँकि हम एक ब्रह्मांडीय व्यवस्था के अंतर-जुड़े हुए हिस्से हैं, इसलिए केवल अपने लिए कार्य करना अतार्किक है। बुद्धिमान व्यक्ति अपनी सबसे बड़ी खुशी और कर्तव्य को निःस्वार्थ सेवा (Sevā) में पाता है। करुणा ही वह तर्कसंगत बल है जो हमें दूसरों के कल्याण (सर्वभूतहिते) में संलग्न होने के लिए प्रेरित करता है, क्योंकि जब संपूर्ण (Whole) ठीक होता है, तभी व्यक्ति (Part) भी ठीक रह सकता है।

अभ्यास: आज आप निःस्वार्थ सेवा (Sevā) का एक छोटा, गुमनाम कार्य पहचानें जिसे आप किसी और के लिए कर सकें (जैसे किसी सहकर्मी या परिवार के सदस्य की मदद करना)। यह कार्य बिना किसी अपेक्षा (Expectation) या धन्यवाद की चाह के करें। केवल करुणा और कर्तव्य के लिए कार्य करने पर ध्यान केंद्रित करें।

प्रस्तुति
डॉ आनंद कुमार शर्मा द्वारा संकलित और सम्पादित पुस्तक “भारतीय दर्शन और पश्चिमी योग (Stoicism)-365 आध्यात्मिक अभ्यास” से साभार

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