दिन 18 (जून)

भारतीय दर्शन से विचार: “उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥” – श्रीमद्भगवद्गीता (6.5)

व्याख्या: “मनुष्य को अपने मन के द्वारा अपना उद्धार करना चाहिए, और स्वयं को नीचा नहीं गिराना चाहिए। मन ही स्वयं का मित्र है, और मन ही स्वयं का शत्रु भी है।”

Stoicism से उद्धरण: “खुशी का एकमात्र स्रोत आपके अपने विचार और सद्गुण हैं, न कि दूसरे लोग या परिस्थितियाँ।” – Stoic सिद्धांत (Autarkeia) का सार

व्याख्या: ज्ञान (विवेक) की सबसे बड़ी देन आंतरिक स्वतंत्रता है, जो आत्म-निर्भरता (Ātma-nirbharatā) से आती है। दोनों दर्शन सिखाते हैं कि खुशी और सुरक्षा के लिए बाहरी साधनों (धन, पद, अन्य लोगों की राय) पर निर्भर रहना हमें कमजोर बनाता है। बुद्धिमान व्यक्ति अपने मन की पूरी जिम्मेदारी लेता है (आत्म-शासन), यह पहचानते हुए कि उनकी आत्मिक उन्नति के लिए आवश्यक उपकरण उनके भीतर ही हैं। अपनी स्वयं की तर्कशक्ति पर भरोसा करके, हम Autarkeia (आत्म-पर्याप्तता) प्राप्त करते हैं।

अभ्यास: आज आप एक ऐसा क्षेत्र पहचानें जहाँ आपने हाल ही में प्रेरणा या संतोष के लिए बाहरी अनुमोदन या सहायता पर अत्यधिक भरोसा किया हो (उदाहरण के लिए, किसी की प्रशंसा का इंतजार करना)। अब, एक रणनीति लिखें कि अगली बार आप वह कार्य केवल अपने लिए कैसे करेंगे, जो केवल आपके आंतरिक मानक और सद्गुण पर आधारित हो।

प्रस्तुति
डॉ आनंद कुमार शर्मा द्वारा संकलित और सम्पादित पुस्तक “भारतीय दर्शन और पश्चिमी योग (Stoicism)-365 आध्यात्मिक अभ्यास” से साभार

Scroll to Top