दिन 18 (अगस्त)

भारतीय दर्शन से विचार: “परिस्थितियाँ तुम्हें चुनौती दे सकती हैं, लेकिन तुम्हारे इरादे (Will) की शक्ति (कर्तृत्व) को नष्ट नहीं कर सकतीं।” – कर्तृत्व (Kartṛtva) सिद्धांत का सार

व्याख्या: मनुष्य के पास कर्म करने और चुनने की आंतरिक शक्ति (कर्तापन) हमेशा रहती है। खुद को पीड़ित (Victim) मानना इस आंतरिक बल को त्यागना है।

Stoicism से उद्धरण: “वे तुम्हारी वस्तुएँ छीन सकते हैं, लेकिन वे तुम्हारे निर्णय लेने की शक्ति (Choice) को नहीं छीन सकते।” – एपिक्टेटस (Epictetus) के सिद्धांत का सार

व्याख्या: आघात सहने की शक्ति (Resilience) इस अटल विश्वास में निहित है कि हमारे पास हमेशा चुनने की स्वतंत्रता है। दोनों दर्शन सिखाते हैं कि सबसे कठिन बाहरी परिस्थितियों में भी, हमारा आंतरिक आत्म (Ātman) संप्रभु (Sovereign) रहता है। कमजोर मन बाहरी घटना से अपनी पहचान जोड़ लेता है और हार मान लेता है। बलवान मन जानता है कि वह प्रभावित हुआ है, लेकिन परिभाषित नहीं। वह अपनी सारी शक्ति प्रतिक्रिया को नियंत्रित करने में लगाता है, और पीड़ित होने से इनकार करता है।

अभ्यास: आज आप एक हालिया निराशाजनक घटना पहचानें जहाँ आपने असहाय महसूस किया हो। अब, मानसिक रूप से उन चीज़ों को सूचीबद्ध करें जिन्हें आप नियंत्रित नहीं कर सकते थे (घटना)। फिर, एक ऐसी चीज़ सूचीबद्ध करें जिसे आप नियंत्रित कर सकते हैं (आपकी प्रतिक्रिया, अगला कदम, दृष्टिकोण)। दृढ़ता से पुष्टि करें: “मैं परिणामों का शिकार (Victim) नहीं हूँ; मैं इरादों का कर्ता (Agent) हूँ।”

प्रस्तुति
डॉ आनंद कुमार शर्मा द्वारा संकलित और सम्पादित पुस्तक “भारतीय दर्शन और पश्चिमी योग (Stoicism)-365 आध्यात्मिक अभ्यास” से साभार

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