दिन 15 (मई)

भारतीय दर्शन से विचार: “मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः। आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥” – श्रीमद्भगवद्गीता (2.14) का सार

व्याख्या: “सुख और दुख देने वाली इंद्रियों और विषयों का संयोग आता-जाता रहता है और क्षणिक (अनित्य) होता है।”

Stoicism से उद्धरण: “अपने मित्र के साथ ऐसा व्यवहार करो जैसे तुम्हें पता हो कि तुम उसे जल्द ही खो दोगे।” – सेनेका (Seneca)

व्याख्या: स्वस्थ संबंध बनाने के लिए हमें यह स्वीकार करना होगा कि हर रिश्ता क्षणभंगुर (अनित्य) है। Stoicism और भारतीय दर्शन दोनों ही सिखाते हैं कि न केवल बाहरी वस्तुएँ, बल्कि हमारे अपने और दूसरों के शरीर भी अस्थायी हैं। इस सत्य को याद करने से हमें आसक्ति से मुक्ति मिलती है और हम लोगों को हल्के में लेना बंद कर देते हैं। यह चिंतन हमें प्रेरित करता है कि हम आज ही अपने प्रियजनों के प्रति दयालु, सच्चे और आभारपूर्ण हों, क्योंकि उनके साथ का हमारा समय सीमित है।

अभ्यास: आज आप किसी एक व्यक्ति को चुनें जिसे आप अक्सर देखते हैं लेकिन जिसकी उपस्थिति को आप मानकर चलते हैं। उन्हें एक ईमानदार और हार्दिक प्रशंसा दें या उनके लिए एक छोटा सा कृतज्ञता नोट लिखें। यह काम तत्काल करें, यह याद रखते हुए कि आपके पास उनके साथ का समय अनिश्चित है।

प्रस्तुति
डॉ आनंद कुमार शर्मा द्वारा संकलित और सम्पादित पुस्तक “भारतीय दर्शन और पश्चिमी योग (Stoicism)-365 आध्यात्मिक अभ्यास” से साभार

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