दिन 14 (जून)

भारतीय दर्शन से विचार: “सर्वं खल्विदं ब्रह्म।” – छान्दोग्य उपनिषद्

व्याख्या: “यह सब कुछ (जितना कुछ हम देखते हैं) वास्तव में ब्रह्म (वह एक परम सत्य) ही है।”

Stoicism से उद्धरण: “जो मधुमक्खी के छत्ते के लिए अच्छा नहीं है, वह मधुमक्खी के लिए भी अच्छा नहीं हो सकता।” – मार्कस ऑरेलियस (Marcus Aurelius)

व्याख्या: ज्ञान (विवेक) हमारे दृष्टिकोण को व्यक्तिगत ‘मैं’ से हटाकर संपूर्ण (Whole) की ओर विस्तृत करता है। दोनों दर्शन सिखाते हैं कि हम ब्रह्मांड की एक अंतर-निर्भर व्यवस्था (Sympatheia) के अलग-थलग हिस्से नहीं हैं, बल्कि एक ही वास्तविकता (ब्रह्म) के अभिन्न अंग हैं। इस एकता को समझने वाला बुद्धिमान व्यक्ति जानता है कि स्वार्थ में कार्य करना तर्कहीन है; हमारा सर्वोच्च हित और कर्तव्य तभी पूरा होता है जब हम सामूहिक कल्याण (छत्ते) के लिए कार्य करते हैं।

अभ्यास: आज आप अपने द्वारा उपयोग की जाने वाली किसी एक सामान्य वस्तु (जैसे एक कप पानी या कोई पहनावा) को पहचानें। 60 सेकंड के लिए, उसकी उत्पत्ति का पता लगाएँ: उन सभी लोगों (किसान, मज़दूर, विक्रेता) और प्राकृतिक संसाधनों की मानसिक सूची बनाएँ जो उस वस्तु को आप तक पहुँचाने में शामिल थे। इस विशाल अंतर-निर्भरता के प्रति कृतज्ञता और एकता का भाव उत्पन्न करें।

प्रस्तुति
डॉ आनंद कुमार शर्मा द्वारा संकलित और सम्पादित पुस्तक “भारतीय दर्शन और पश्चिमी योग (Stoicism)-365 आध्यात्मिक अभ्यास” से साभार

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