दिन 7 (अक्टूबर)

भारतीय दर्शन से विचार: वाणी का तप (Austerity of Speech) वह अभ्यास है जहाँ हम बिना उत्तेजना पैदा किए सत्य, प्रिय और हितकारी (Beneficial) शब्दों का ही प्रयोग करते हैं। अनावश्यक बोलना मानसिक ऊर्जा को नष्ट करता है।

Stoicism सेउद्धरण: “मौन को अपना सामान्य नियम (General Rule) बनाओ; या केवल वही बोलो जो आवश्यक हो और कम शब्दों में।” – एपिक्टेटस (Epictetus)

व्याख्या: आंतरिक स्वतंत्रता (Sva-Tantra) की रक्षा करने के लिए हमें अपरिग्रह (Aparigraha, Day 6) के सिद्धांत को शब्दों पर भी लागू करना होगा। अनियंत्रित वाणी (Uncontrolled Speech) बाहरी जटिलता और अशांति पैदा करती है, जो हमारे संतोष (Santoṣa) को भंग करती है। दोनों दर्शन सिखाते हैं कि मौन (Mauna) एक शक्तिशाली अनुशासन है जो हमें प्रतिक्रिया करने के बजाय सोचने का समय देता है। जब हम कम बोलते हैं, तो हम अपनी सत्यनिष्ठा (Satya) को बनाए रखते हैं और आंतरिक दुर्ग को सुरक्षित करते हैं।

अभ्यास: आज आप एक विशिष्ट छोटी अवधि (जैसे यात्रा के दौरान या सुबह उठने के तुरंत बाद) के लिए मौन (Mauna) का अभ्यास करने के लिए प्रतिबद्ध हों। इसके अतिरिक्त, किसी चुनौतीपूर्ण बातचीत के दौरान अपनी वाणी पर विशेष ध्यान दें: अपने दृष्टिकोण को व्यक्त करने के लिए तीन से अधिक वाक्य प्रयोग न करें, और सुनिश्चित करें कि आपके शब्द सत्य, शांत और लाभकारी हों। पुष्टि करें: “मेरा मौन (Mauna) मेरी आंतरिक शक्ति है।”

प्रस्तुति
डॉ आनंद कुमार शर्मा द्वारा संकलित और सम्पादित पुस्तक “भारतीय दर्शन और पश्चिमी योग (Stoicism)-365 आध्यात्मिक अभ्यास” से साभार

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