दिन 13 (सितम्बर)

भारतीय दर्शन से विचार: “यदि तुम्हारा कार्य सही है, तो निंदा (Blame) तुम्हें दुखी नहीं कर सकती; यदि गलत है, तो प्रशंसा (Praise) तुम्हें बचा नहीं सकती।” – निंदा-स्तुति समता (Nindā-Stuti Samatā) सिद्धांत का सार

व्याख्या: ज्ञानी पुरुष दूसरों की राय को क्षणिक (Transient) और बाहरी (External) मानता है। सच्चा कर्म आंतरिक कर्तव्य से प्रेरित होता है, न कि सामाजिक पुरस्कारों से।

Stoicism से उद्धरण: “दूसरों की राय (Opinion) हवा की तरह है; यह तुम्हारे कर्म को प्रभावित नहीं कर सकती।” – बाह्य के प्रति उदासीनता (Indifference to Externals) का सार

व्याख्या: करुणापूर्ण कर्म (Compassionate Action) तभी शुद्ध रहता है जब हम निंदा और प्रशंसा दोनों के प्रति समान भाव (Samatā) रखते हैं। दोनों दर्शन सिखाते हैं कि मान्यता (Recognition) की चाहत हमें निंदा के डर के प्रति असुरक्षित बना देती है। बलवान कर्ता अपने कार्य के नैतिक मूल्य को भीतर से तय करता है, न कि बाहर की ताली या आलोचना से। यह समता ही हमें डर या अहंकार के बिना, लगातार सही कार्य (Dharma) करने की शक्ति देती है।

अभ्यास: आज आप एक कार्य पहचानें जहाँ आपको सकारात्मक या नकारात्मक प्रतिक्रिया (Feedback) मिलने की उम्मीद है (जैसे कोई रिपोर्ट सौंपना या कठिन बातचीत करना)। कार्य करने से पहले और बाद में, मानसिक रूप से पुष्टि करें कि दूसरे का निर्णय आपके प्रयास की नैतिक गुणवत्ता के लिए असंगत (Irrelevant) है। दृढ़ता से पुष्टि करें: “मैं निंदा और प्रशंसा दोनों के प्रति सम (Same) हूँ।”

प्रस्तुति
डॉ आनंद कुमार शर्मा द्वारा संकलित और सम्पादित पुस्तक “भारतीय दर्शन और पश्चिमी योग (Stoicism)-365 आध्यात्मिक अभ्यास” से साभार

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