दिन 12 (जुलाई)

भारतीय दर्शन से विचार: “दूसरों को वैसे ही स्वीकार करो, जैसे वे हैं, न कि जैसे तुम उन्हें चाहते हो।” – सहजता और सहनशीलता (Sahishṇutā) का सिद्धांत

व्याख्या: हर व्यक्ति अपूर्ण है। उनके स्वभाव को बदलने का प्रयास करने के बजाय, दयालुता (Mṛdu) और धैर्य के साथ उनके अस्तित्व को स्वीकार करना ही सच्ची शांति है।

Stoicism से उद्धरण: “सुबह उठकर अपने आप से कहो: जिन लोगों से मैं आज मिलूंगा, वे दखल देने वाले, कृतघ्न, अभिमानी, बेईमान और ईर्ष्यालु होंगे… लेकिन मैं उनमें से किसी से भी न तो आहत हो सकता हूँ और न ही क्रोधित, क्योंकि हम सहयोग के लिए बने हैं।” – मार्कस ऑरेलियस (Marcus Aurelius)

व्याख्या: साहसी कर्म (Action) के लिए सहनशीलता (Tolerance) आवश्यक है। दोनों दर्शन सिखाते हैं कि दूसरों की अपरिहार्य (Unavoidable) अपूर्णताओं को बदलने की कोशिश में ऊर्जा बर्बाद करना तर्कहीन है। साहसी व्यक्ति यह जानता है कि सभी मनुष्य एक-दूसरे से बंधे हुए हैं, और वह उनके दोषों पर क्रोधित या आहत होने से इनकार करता है। वह नरमी (Mṛdu) से काम लेता है, अपनी प्रतिक्रिया को नियंत्रित करता है, और सहयोग पर ध्यान केंद्रित करता है।

अभ्यास: आज आप एक व्यक्ति की विशेष कमी या परेशान करने वाली आदत को पहचानें, जो आमतौर पर आपको चिड़चिड़ा करती है। सचेत रूप से उस कमी पर प्रतिक्रिया न करने का चुनाव करें। इसके बजाय, आंतरिक रूप से दोहराएँ: “मैं अपनी प्रतिक्रिया को नियंत्रित करता हूँ। मैं उनकी अपूर्णता को स्वीकार करता हूँ।”

प्रस्तुति
डॉ आनंद कुमार शर्मा द्वारा संकलित और सम्पादित पुस्तक “भारतीय दर्शन और पश्चिमी योग (Stoicism)-365 आध्यात्मिक अभ्यास” से साभार

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