दिन 11 (जून)

भारतीय दर्शन से विचार: “तपसा कल्मषं हन्ति।” – प्राचीन सूक्ति

व्याख्या: “तपस्या (स्वैच्छिक कष्ट या आत्म-संयम) के द्वारा अशुद्धियाँ (मानसिक या नैतिक दोष) नष्ट हो जाती हैं।”

Stoicism से उद्धरण: “कुछ दिनों को अलग रखो, जिस दौरान तुम सबसे साधारण और सस्ते भोजन से, खुरदरे कपड़ों से संतुष्ट रहोगे, और स्वयं से कहोगे: ‘क्या यह वह स्थिति है जिससे मैं डरता था?’” – सेनेका (Seneca)

व्याख्या: ज्ञान (विवेक) केवल विचारों को जानना नहीं है, बल्कि कठिनाई के लिए स्वयं को प्रशिक्षित करना है। दोनों दर्शन सिखाते हैं कि जानबूझकर छोटे-मोटे, गैर-आवश्यक कष्टों (तपस्या) को स्वीकार करके, हम अपने मन को भविष्य के बड़े दुखों के लिए अभेद्य बनाते हैं। यह अभ्यास आराम की आदतों से हमारी आसक्ति को तोड़ता है, डर को नष्ट करता है, और हमें उस भीतरी शक्ति का अनुभव कराता है जो बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती।

अभ्यास: आज आप जानबूझकर किसी एक छोटी शारीरिक सुविधा (Non-essential Comfort) से स्वयं को वंचित करें (जैसे: कुछ मिनटों के लिए बिना सहारा लिए सीधे बैठना, सामान्य से थोड़ी ठंडी फुहार लेना, या अपने पसंदीदा पेय को छोड़ देना)। अभ्यास के दौरान, अपने आप से पूछें: “क्या इस कष्ट ने मेरी आंतरिक शांति या चरित्र को प्रभावित किया है?”

प्रस्तुति
डॉ आनंद कुमार शर्मा द्वारा संकलित और सम्पादित पुस्तक “भारतीय दर्शन और पश्चिमी योग (Stoicism)-365 आध्यात्मिक अभ्यास” से साभार

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