दिन 31 (मई)

भारतीय दर्शन से विचार: “वसुधैव कुटुम्बकम्।” – महा उपनिषद्

व्याख्या: “यह सारी पृथ्वी ही एक परिवार है।”

Stoicism से उद्धरण: “हम सब एक ही समुदाय के नागरिक हैं, जो मनुष्यता कहलाता है।” – मार्कस ऑरेलियस (Marcus Aurelius) के दर्शन का सार

व्याख्या: इस पूरे माह का अभ्यास (धैर्य, करुणा, न्याय और कर्तव्य) एक ही अंतिम उद्देश्य की ओर इशारा करता है: मानवता की एकता। दोनों दर्शन सिखाते हैं कि हमारे छोटे, व्यक्तिगत संबंध अंततः विश्व-बंधुत्व (Cosmopolitanism) के बड़े कर्तव्य का हिस्सा हैं। Stoicism यह पहचानता है कि तर्क (Reason) का नियम हमें एक-दूसरे से जोड़ता है। जब हम अपनी छोटी भूमिकाओं में ईमानदारी से सद्गुण का अभ्यास करते हैं, तो हम वास्तव में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के आदर्श को साकार करने में मदद करते हैं।

अभ्यास: अपनी जर्नल खोलें और इस माह के ‘संबंध और समुदाय’ विषय से सीखे गए सभी अभ्यासों (सहिष्णुता, ईमानदारी, दयालुता आदि) की समीक्षा करें। उस एक सद्गुण को पहचानें जिसे अभ्यास करना आपके लिए सबसे कठिन रहा है। उस सद्गुण पर अगले सप्ताह ध्यान केंद्रित करने का लिखित संकल्प लें। यह आपका विश्व-परिवार के प्रति व्यक्तिगत योगदान है।

प्रस्तुति
डॉ आनंद कुमार शर्मा द्वारा संकलित और सम्पादित पुस्तक “भारतीय दर्शन और पश्चिमी योग (Stoicism)-365 आध्यात्मिक अभ्यास” से साभार

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