दिन 17 (मई)

भारतीय दर्शन से विचार: “अकृतज्ञस्य नोपदेशं दद्यात्।” – प्राचीन सूक्ति

व्याख्या: “कृतघ्न (जो एहसान नहीं मानता) को उपदेश नहीं देना चाहिए।” (यह कथन कृतज्ञता (Kr̥tajñatā) के महत्व को दर्शाता है कि यह रिश्तों की नींव है)।

Stoicism से उद्धरण: “लाभ प्राप्त करने वाले को इसे कभी नहीं भूलना चाहिए; लाभ देने वाले को इसे कभी याद नहीं रखना चाहिए।” – सेनेका (Seneca)

व्याख्या: संबंधों में कृतज्ञता (Gratitude) वह गोंद है जो उन्हें मज़बूती से जोड़े रखता है। दोनों दर्शन सिखाते हैं कि कृतज्ञता एकतरफा नहीं, बल्कि एक दोहरी प्रक्रिया है। भारतीय दृष्टिकोण हमें चेतावनी देता है कि कृतघ्नता (Ingratitude) किसी भी रिश्ते की आत्मा को नष्ट कर देती है। वहीं, Stoicism हमें एक आदर्श व्यवहार सिखाता है: जो प्राप्त करता है उसे हमेशा स्मरण रखना चाहिए, और जो देता है उसे तुरंत भूल जाना चाहिए। यह अभ्यास यह सुनिश्चित करता है कि रिश्ते निस्वार्थ प्रेम पर आधारित हों, न कि लेनदेन की अपेक्षाओं पर।

अभ्यास: आज आप किसी एक व्यक्ति को चुनें जो आपके लिए कोई छोटा लेकिन लगातार किया जाने वाला कार्य करता हो (जैसे सहकर्मी या परिवार का सदस्य)। उनकी नोटबुक में उन तीन विशिष्ट छोटी चीज़ों को लिखें जिनके लिए आप उनके आभारी हैं, लेकिन जिन्हें आप आमतौर पर स्वीकार करना भूल जाते हैं। इस कृतज्ञता को व्यक्त करने का एक तरीका खोजें।

प्रस्तुति
डॉ आनंद कुमार शर्मा द्वारा संकलित और सम्पादित पुस्तक “भारतीय दर्शन और पश्चिमी योग (Stoicism)-365 आध्यात्मिक अभ्यास” से साभार

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