Ved-Vaani – ऋग्वेद || ४-४-१ ||

ज्ञान के अनुपात में हमारा मन पवित्र होता है! पवित्रता के अनुपात में हम धन कमाने के विषय में सुमति को बनायें रखते हैं! देवों के सम्पर्क में चलते हैं! प्रभु रुप मित्र से सब धनों को प्राप्त करते हैं!

व्याख्या

हमें द्युलोक और अन्तरिक्ष लोक के पृथिवीस्थ लोकों के पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करना है! यही तीन समिधाएं कहलाती है

जितना जितना हम त्रिलोकी के पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करते चलते हैं उतना उतना उत्तम मन वाले हमारे लिए होईये!

अर्थात आप हमें उत्तम मन प्राप्त कराइये, वस्तुत: ज्ञान ही तो मन को पवित्र बनायेगा!

मन को अधिकाधिक शुचिता के अनुसार आप धनकी कल्याणमयी मति को हमारे लिए देते हैं!

पवित्रता होने पर हम कभी भी छल छिद्र से धन कमाने का ध्यान नहीं करते हैं!

हे दिव्य गुणों के पुञ्ज प्रभु!आप संगतिकरण के लिए हमें देवों को प्राप्त कराते हैं, इससे हम भी देव वृत्ति वाले बनते हैं!

हे अग्रणी प्रभु!सब के मित्र आप उत्तम मन वाले होते हुए हम सखायो को सब धनादि आवश्यक पदार्थों को देने वाले हैं!

प्रभु हमें उत्तम मन प्राप्त कराते हैं! साथ ही सब आवश्यक धनादि पदार्थों को देते हैं! *मन्त्र का भाव है कि- हमारा मन पवित्र होता है हम धनार्जन के लिए सुमति बनायें रखें

देवों के सम्पर्क में ही चलें! प्रभु रुप मित्र से ही सब धनों को प्राप्त करते हैं

प्रस्तुतकर्ता

सुमन भल्ला
द्वारका दिल्ली
( वेद प्रचारिका महर्षि दयानंद सरस्वती सेवा समिति)

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